तेनालीराम की कहानी: राजगुरु की चालएक समय की बात है, विजयनगर साम्राज्य के राजा कृष्णदेवराय के दरबार में राजगुरु अपनी चतुराई और चालाकी के लिए मशहूर थे। लेकिन वे तेनालीराम को पसंद नहीं करते थे क्योंकि तेनालीराम अपनी बुद्धिमानी से हमेशा उनकी चालों को नाकाम कर देता था।
एक दिन, राजगुरु ने तेनालीराम को नीचा दिखाने की योजना बनाई। उन्होंने राजा से कहा, “महाराज, तेनालीराम सिर्फ बातों में चतुर है, लेकिन जब उसे कोई बड़ा काम दिया जाए, तो वह असफल हो जाएगा।”राजा ने पूछा, “तुम्हारा क्या सुझाव है?”राजगुरु ने कहा, “तेनालीराम को ऐसा काम दीजिए जो नामुमकिन हो, और जब वह असफल हो, तो उसे दरबार से निकाल दीजिए।”राजा को यह बात उचित लगी।
उन्होंने तेनालीराम को बुलाया और कहा, “तेनाली, तुम्हें कल सुबह तक ऐसा काम करना है जिससे पूरे नगर में केवल दूध की नदियां बहें। अगर तुम यह नहीं कर पाए, तो तुम्हें दंड मिलेगा।”तेनालीराम समझ गया कि यह राजगुरु की चाल है। उसने राजा से विनम्रता से कहा, “महाराज, यह संभव है। लेकिन मुझे इसके लिए पूरे नगरवासियों का सहयोग चाहिए।” राजा ने अनुमति दे दी।
उस रात, तेनालीराम ने एक घोषणा करवाई कि सुबह सभी नगरवासी एक बाल्टी दूध लेकर नगर के मुख्य चौक पर जमा हों। जिसने दूध न लाया, उसे भारी जुर्माना देना होगा।अगली सुबह, लोग बाल्टी लेकर चौक पर जमा हुए। लेकिन उनमें से कई ने सोचा, “अगर मैं दूध की जगह पानी भर दूं, तो कौन जान पाएगा? इतने सारे लोगों के दूध में मेरा पानी मिलकर छुप जाएगा।”
जब सभी बाल्टियां चौक में डाली गईं, तो वह पूरी तरह पानी से भरी हुई थी। तेनालीराम ने राजा को यह दिखाया और कहा, “महाराज, यह दूध की नदी है, जो नगरवासियों के सहयोग से बननी थी। लेकिन सबने धोखा दिया।”राजा ने तेनालीराम की बुद्धिमानी और राजगुरु की चालाकी को समझ लिया। उन्होंने राजगुरु को चेतावनी दी कि आगे से ऐसी चालें न चलें।इस प्रकार तेनालीराम ने अपनी बुद्धिमानी से एक बार फिर राजगुरु की चाल को नाकाम कर दिया।