तेनालीराम और जादूगर
विजयनगर के राजा कृष्णदेवराय के दरबार में एक दिन एक जादूगर आया। वह दूर देश से आया था और अपने जादू से पूरे राज्य में मशहूर हो गया। जादूगर ने राजा के दरबार में चुनौती दी, “महाराज, मैं ऐसा जादू जानता हूँ जिसे कोई भी व्यक्ति नहीं तोड़ सकता। यदि आपके दरबार में कोई मेरा जादू तोड़ सके, तो मैं उसकी बुद्धिमानी को स्वीकार करूंगा।”
राजा ने तुरंत अपने प्रिय मंत्री तेनालीराम को बुलाया और कहा, “तेनाली, इस जादूगर की चुनौती स्वीकार करो। अगर तुमने इसे हराया, तो यह हमारे राज्य का गौरव बढ़ेगा।”जादूगर ने तेनालीराम को चुनौती दी, “मैं तुम्हारे हाथों को एक जादू से बाँध दूँगा। अगर तुम इसे खोल पाओ, तो मैं हार मान लूंगा।”तेनालीराम मुस्कुराए और बोले, “ठीक है, मैं यह चुनौती स्वीकार करता हूँ।”जादूगर ने कुछ मंत्र पढ़े और एक रस्सी लेकर तेनालीराम के हाथ बाँध दिए।
रस्सी इतनी मजबूती से बंधी हुई थी कि देखने वाले दरबारी हैरान रह गए। जादूगर ने गर्व से कहा, “अब इसे खोलकर दिखाओ।”तेनालीराम ने रस्सी को ध्यान से देखा और कहा, “वाह, आपकी जादूगरी तो सच में कमाल की है। लेकिन क्या आप इसे थोड़ा और मजबूत बना सकते हैं?”जादूगर को लगा कि तेनालीराम हार मानने वाला है। उसने रस्सी को और कस दिया।तेनालीराम ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे, यह तो बहुत ढीली लग रही है। इसे और कस दीजिए।”जादूगर ने रस्सी को इतनी कस दी कि वह खुद भी उलझ गया और उसकी अंगुलियाँ रस्सी में फंस गईं।
अब जादूगर रस्सी को ढीला नहीं कर पा रहा था।तेनालीराम ने मौका देखकर कहा, “अब मैं इस रस्सी को खोलने की कोशिश करता हूँ।” उसने अपने दिमाग से एक छोटी सी चाल चली और जादूगर से कहा, “पहले तुम अपने हाथ बाहर निकालो, तभी मैं इसे खोल सकता हूँ।”जादूगर ने बहुत कोशिश की, लेकिन खुद को छुड़ा नहीं पाया।
अंत में उसे तेनालीराम से मदद मांगनी पड़ी। तेनालीराम ने आसानी से रस्सी खोल दी और जादूगर की चालाकी का पर्दाफाश कर दिया।राजा और सभी दरबारी तेनालीराम की बुद्धिमानी पर बहुत खुश हुए। राजा ने तेनालीराम को इनाम दिया और जादूगर को अपने घमंड का सबक सिखाया।
सीख:अहंकार और घमंड हमेशा हार का कारण बनते हैं। सच्ची शक्ति बुद्धिमानी में होती है।