राजा और मछुआरा
बहुत समय पहले की बात है, एक राजा था जो अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखता था। एक दिन वह अपने राज्य में घूमने निकला। रास्ते में उसने एक गरीब मछुआरे को देखा, जो नदी के किनारे बैठा था और अपने जाल को ठीक कर रहा था।
राजा ने उससे पूछा, “तुम्हारा दिन कैसा बीत रहा है?”मछुआरे ने विनम्रता से कहा, “महाराज, मैं बस अपनी आजीविका के लिए मछलियाँ पकड़ता हूँ। जो मिलता है, उसी में संतोष करता हूँ।”राजा को उसकी संतोषी प्रवृत्ति अच्छी लगी। उसने मछुआरे से पूछा, “अगर तुम्हें कुछ माँगने का अवसर दिया जाए, तो तुम क्या माँगोगे?”
मछुआरा मुस्कुराया और बोला, “महाराज, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मेरे पास जो है, मैं उसी में खुश हूँ।”राजा ने आश्चर्य से कहा, “तुम धन, महल, या कोई और इनाम क्यों नहीं माँगते?”मछुआरे ने उत्तर दिया, “महाराज, सच्ची खुशी धन से नहीं, बल्कि संतोष से मिलती है। अगर मैं ज्यादा माँगूंगा, तो मेरी इच्छाएँ बढ़ती जाएँगी और मैं कभी संतुष्ट नहीं हो पाऊँगा।”
राजा मछुआरे की बुद्धिमत्ता से प्रभावित हुआ और उसने उसे कुछ स्वर्ण मुद्राएँ उपहार में दीं। लेकिन मछुआरे ने विनम्रता से कहा, “महाराज, मैं अपनी मेहनत से जो कमाता हूँ, वही मेरे लिए सबसे बड़ा इनाम है।”राजा ने मछुआरे की सोच की सराहना की और अपने महल लौट आया। उसने समझ लिया कि सच्चा सुख संतोष में ही है, न कि धन-संपत्ति में।
शिक्षा:
सच्ची खुशी धन या ऐश्वर्य में नहीं, बल्कि संतोष और मेहनत से कमाए गए सुख में होती है।