कवि और राजा का महल
प्राचीन समय की बात है। एक राज्य में एक महान कवि रहता था, जिसकी कविताएँ ज्ञान, सत्य और भलाई की बातें सिखाती थीं। राजा भी उसकी कविताओं से बहुत प्रभावित था और उसे दरबार में सम्मानित किया करता था।
राजा का अहंकार
समय बीतने के साथ राजा के मन में अहंकार आ गया। उसे लगा कि उसके पास सबसे सुंदर महल, सबसे कीमती आभूषण और अपार धन-संपत्ति है, जिससे वह सबसे महान राजा बन गया है।एक दिन राजा ने कवि को बुलाकर कहा, “मैंने अपने महल को स्वर्ण से जड़वा दिया है, इसमें हीरे-मोती लगे हैं। बताओ, क्या इससे सुंदर कोई जगह हो सकती है?”
कवि मुस्कुराया और बोला, “राजन, आपकी महल की भव्यता तो अपार है, लेकिन इससे सुंदर एक और स्थान भी है।”राजा चौंका और बोला, “वह कौन सा स्थान है? मुझे बताओ!”
कवि का उत्तर
कवि ने कहा, “राजन, सबसे सुंदर स्थान एक अच्छे इंसान का हृदय होता है, जहाँ प्रेम, करुणा और सच्चाई निवास करते हैं।
सोने-चाँदी से महल तो बन सकता है, लेकिन सच्चे प्रेम और भलाई से ही एक सुंदर जीवन बनता है।”राजा को कवि की बात समझ में आ गई। उसने अपने अहंकार को त्याग दिया और प्रजा के हित में कार्य करने का संकल्प लिया।
शिक्षा
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि बाहरी वैभव से अधिक महत्वपूर्ण मन की अच्छाई और दूसरों के प्रति प्रेम होता है।