उबासी की सजा – तेनाली रामन की कहानी
एक बार की बात है, विजयनगर साम्राज्य के राजा कृष्णदेव राय अपने दरबार में दरबारियों के साथ बैठे थे। अचानक, राजा को उबासी आ गई। उन्होंने बिना मुंह ढके उबासी ली। यह देखकर, पास खड़े एक दरबारी ने उन्हें टोक दिया और कहा, “महाराज, उबासी लेते समय मुंह ढकना चाहिए। यह शिष्टाचार का हिस्सा है।”
राजा ने इस बात को मजाक में लेते हुए कहा, “उबासी लेना तो स्वाभाविक है। इसमें गलती क्या है? यदि कोई इसे अनुचित समझता है, तो उसे सजा मिलनी चाहिए।”राजा के इस कथन को सुनकर, तेनाली रामन ने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देने का सोचा।
उन्होंने राजा से कहा, “महाराज, उबासी लेना स्वाभाविक है। लेकिन अगर इसे रोकने की सजा दी जाएगी, तो दोषी कौन होगा?”राजा ने मुस्कुराते हुए कहा, “उबासी लेने वाला दोषी है। उसे सजा मिलनी चाहिए।”यह सुनकर तेनाली रामन ने चतुराई से उत्तर दिया, “महाराज, यदि ऐसा है, तो दोषी तो वही व्यक्ति है जिसने पहली बार उबासी ली।
क्योंकि उसी ने यह श्रृंखला शुरू की।”राजा ने आश्चर्य से पूछा, “तो फिर बताओ, पहली उबासी किसने ली?”तेनाली रामन ने हंसते हुए कहा, “महाराज, वह तो आप ही थे।
इसलिए यदि सजा देनी हो, तो खुद को ही दें।”यह सुनकर दरबार में हंसी का ठहाका गूंज उठा। राजा कृष्णदेव राय तेनाली रामन की चतुराई और हाजिरजवाबी से बहुत खुश हुए। उन्होंने तेनाली रामन की प्रशंसा की और उन्हें इनाम दिया।
नैतिक शिक्षा:हमें हर स्थिति में अपनी बुद्धिमानी और चतुराई से काम लेना चाहिए। साथ ही, दूसरों पर दोषारोपण करने से पहले खुद का आकलन करना जरूरी है।