चतुर चित्रकार
— एक कविता
कैनवास पर रंग बिखेरे, बड़ा चतुर चित्रकार,
हर रेखा में छिपा हुआ, जादू का संसार।
सूरज को भी थाम ले, अपनी रंगों की डोरी,
चाँद-सितारों को भर दे, चमकीली रंगोली।
सादा सा दिखता ब्रश, पर अद्भुत है इसका खेल,
हर कोने में बसा हुआ, रंगों का अनमोल मेल।
बूँद-बूँद से गढ़ता, प्रकृति के सुंदर दृश्य,
हर रंग में बसी होती, जीवन की सजीव दृष्टि।
पेड़-पत्ते, झरने, पर्वत, सब बनते जादू से,
चित्रकार के हाथों से, झलकें सपनों के धुंधले किस्से।
बिना शब्दों के बोलता, हर चित्र अनगिन बात,
सन्नाटा भी गूंज उठे, उसके रंगों के साथ।
कभी बारिश, कभी धूप, कभी मन का कोई हाल,
हर तस्वीर में झलके, चित्रकार की बेमिसाल चाल।
कैनवास के कोने-कोने में, ज़िंदगी का सार,
ऐसे होते हैं सच्चे, चतुर चित्रकार।
उसके रंगों की दुनिया में, सब कुछ होता है खास,
एक झलक में दिख जाए, जीवन का पूरा इतिहास।
हम भी सीखें उससे, रचें अपना संसार,
बनें सपनों के मालिक, बनें चतुर चित्रकार।
यह कविता एक चित्रकार की कल्पनाशीलता, उसकी कला और उसकी दृष्टि की अद्भुतता को समर्पित है।