चौका-छक्का / Choka Chakka

चौका छक्का

चौका-छक्का
(क्रिकेट की बातों से प्रेरित एक कविता)

जब बल्ला गूंजे, चौके-छक्के बरसे,
दिलों में उमंग हो, जैसे सपना हरसे।
मैदान में खिलाड़ी जब झूमते हैं,
हर गेंद पर जज्बात उफनते हैं।

पहला चौका, जैसे बिजली चमकी,
शब्दों में उलझी, ये पिच भी दमकी।
गेंद लपके आसमान को चूमे,
हर सांस में रोमांच घूमें।

छक्का जब लगे, भीड़ चिल्लाए,
दिल धड़कता, वक्त रुक जाए।
खुशियों की गूंज चारों ओर गूंजे,
जीत का जुनून दिलों में झूमें।

क्रिकेट नहीं, ये एक जज्बा है,
हर चौके-छक्के में सपना है।
बल्ले की ताकत, गेंद की चाल,
हर खिलाड़ी में बसता कमाल।

तो उठो, जियो, इस खेल को जी लो,
हर चौके-छक्के का मज़ा तुम पी लो।
क्योंकि ये खेल नहीं, ये त्योहार है,
क्रिकेट हमारी रगों का प्यार है।