कितनी बड़ी दिखती होंगी
आसमान की ऊंचाई पर,
जो चिड़िया उड़ती होगी,
सोचती हूं, नीचे से,
वो कितनी बड़ी दिखती होंगी।
सूरज की किरणों में झूलती,
बादलों संग खेलती होंगी,
हमारी छोटी आंखों को,
क्या वो विशाल लगती होंगी?
समंदर की गहराई में,
जो मछलियां तैरती होंगी,
सोचती हूं, ऊपर से,
वो कितनी बड़ी दिखती होंगी।
पर्वतों की चोटी पर,
जो बर्फ सफेद बिछी होती,
क्या वहां खड़े होकर,
धरती छोटी दिखती होती?
मन के असीम आकाश में,
जो सपने उड़ते जाते,
क्या वो हर बार हमें,
थोड़े बड़े ही नजर आते?
दूरियां और नजरों का खेल,
सब कुछ सिमट जाता है,
हमारी कल्पना की आंखों में,
हर आकार बड़ा हो जाता है।